ऑफिस की कॉफी मशीन

Home Default Forums Couples ऑफिस की कॉफी मशीन

Viewing 1 post (of 1 total)
  • Author
    Posts
  • #1558
    blushprevious
    Participant

    मैं प्रिया। हाँ, एक लड़की भी खेल सकती है। अक्सर लोग सोचते हैं कि कैसीनो सिर्फ पुरुषों का अड्डा है। पर मैं आपको अपनी कहानी सुनाती हूँ। मैं एक निजी बैंक में काम करती हूँ, गुड़गाँव में। नौकरी में नंबर से खेलना मेरी रोज़ की आदत है। हिसाब-किताब, ब्याज, ईएमआई—यही सब चलता है। दिमाग दिन भर जलता रहता है। तनाव कम करने के लिए मैं कभी योग करती थी, कभी किताबें पढ़ती थी। पर पिछले कुछ महीनों से काम का बोझ इतना बढ़ गया कि मैंने सारे शौक छोड़ दिए।

    एक दिन ऑफिस में कॉफी मशीन के पास मेरी मुलाकात अरुण से हुई। अरुण हमारे अकाउंट्स डिपार्टमेंट में है। बेहद शांत और समझदार इंसान। उस दिन बातचीत करते हुए उसने बताया कि वो एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर छोटे-छोटे गेम खेलता है। मैंने मज़ाक में कहा, “पैसे के हिसाब से खेलना तो तुम्हें आता ही है।”

    वो हँसा। फिर बोला, “प्रिया, तुम भी देखो कभी। शुरू में डर लगता है, पर एक बार समझ आ गया तो मज़ा आता है। बस दिमाग से खेलना, दिल से नहीं।”

    मैंने अनसुना कर दिया। पर उस रात नींद नहीं आई। सोचा, चलो, देखते हैं क्या है। मैंने अपने कमरे में अकेले में फोन उठाया। अरुण ने एक लिंक दिया था। मैंने क्लिक किया। साइट खुली। मुझे थोड़ा अजीब लगा। पहली बार ऐसी चीज़ देख रही थी। पर सब कुछ साफ-सुथरा था। मैंने वहाँ रजिस्टर किया। उसने पहले ही बता दिया था कि कभी-कभी लिंक बदल जाते हैं, पर सही पता होना चाहिए। उसने कहा था, “Vavada access mirror पर जाओ, वहाँ कभी दिक्कत नहीं होती।”

    मैंने उसी मिरर को नोट कर लिया। पहली बार मैंने सिर्फ 300 रुपये डाले। सोचा, बस टाइमपास। मैंने एक साधारण सा कार्ड गेम चुना। नियम सीखने में पाँच मिनट लगे। पहला दांव लगाया, हार गई। दूसरा, हार गई। तीसरा, जीत गई। चौथा, फिर हार। इस तरह बीस मिनट में मेरे 300 रुपये घटकर 90 रुपये रह गए। मैं हँसी। सोचा, “देखा, मुझसे नहीं होगा।”

    पर अचानक एक बोनस गेम खुल गया। मुझे नहीं पता था कि ये कैसे हुआ। स्क्रीन पर तीन पत्ते दिखे। मुझे एक चुनना था। मैंने बीच वाला चुन लिया। उसके पीछे 500 रुपये लिखा था। फिर दूसरा पत्ता खुला, 200 रुपये। तीसरा खुला, 1,000 रुपये। मैं स्तब्ध रह गई। मेरे 90 रुपये अचानक 1,790 रुपये हो गए। मैंने तुरंत “निकालें” दबाया। पैसे आ गए। सच में आ गए।

    उस रात मैंने अपने आपसे कहा, “प्रिया, ये बस संयोग था। अब दोबारा मत खेलना।”

    लेकिन मैंने खेला। अगले दिन और उसके अगले दिन। शुरू में बढ़िया चल रहा था। मैंने 2,000 रुपये के प्रॉफिट में देखा कि ये तो आसान है। फिर मैंने लालच किया। एक दिन 3,000 रुपये का दांव लगा बैठी। हार गई। उसी रात गुस्से में 5,000 और लगाए। सब गए। मेरे एक हफ्ते की मेहनत का प्रॉफिट और मेरे अपने पैसे—कुल 8,000 रुपये—एक घंटे में उड़ गए।

    मैं फूट-फूट कर रोई। अपने आपसे नफरत हो गई। अगले दिन ऑफिस में अरुण से आँखें नहीं मिला रही थी। शाम को उसने खुद आकर पूछा, “प्रिया, क्या हुआ? तुम ठीक नहीं लग रही हो।”

    मैंने सब बता दिया। वो चुप रहा। फिर बोला, “तुमने वही गलती की जो सब करते हैं। मैंने कहा था न, दिमाग से खेलो। बिना प्लान के मत उतरो।”

    उसने अपना फोन निकाला। मुझे एक स्क्रीनशॉट दिखाया। उसके नोट्स में लिखा था—”हर हफ्ते सिर्फ 1,000 का खर्च। जीत का 50% निकाल लो, 50% बैंक में रखो। हारे तो उस हफ्ते खेल बंद।”

    मैंने वो नियम कॉपी कर लिए। उसके बाद मैंने फिर से Vavada access mirror खोला। इस बार अलग मानसिकता के साथ। मैंने तय किया कि अब हर रविवार को सिर्फ 500 रुपये डालूंगी। चाहे कुछ भी हो, उससे ज़्यादा नहीं। और खेलने के लिए सिर्फ 45 मिनट का टाइमर लगाऊंगी।

    पहले हफ्ते मैंने 200 रुपये का फायदा किया। दूसरे हफ्ते 300 का नुकसान। तीसरे हफ्ते 500 का फायदा। चौथे हफ्ते कुछ नहीं। मैंने हार को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। धीरे-धीरे मैंने देखा कि मेरा नजरिया बदल गया है। मैं अब पैसा कमाने नहीं, बल्कि मनोरंजन के लिए खेल रही थी। और यही बात थी जिसने मुझे बचा लिया।

    धीरे-धीरे तीन महीने बीत गए। अब तक मैंने कुल 4,500 रुपये का शुद्ध फायदा कमाया था। ये कोई बड़ी रकम नहीं थी, लेकिन इस पैसे से मैंने अपनी छोटी बहन के लिए जन्मदिन का केक और गिफ्ट खरीदा। उसकी खुशी देखकर मुझे लगा कि ये जीत असली थी।

    एक शाम मैंने ऑफिस की सहेलियों को अपने घर बुलाया। तीन लड़कियाँ थीं। हमने खाना बनाया, हँसे-मज़ाक किया। फिर देर रात मैंने उन्हें वो प्लेटफॉर्म दिखाया। उनमें से दो ने कहा, “हमें भी सिखाओ।” मैंने उन्हें समझाया कि ये खेल है, कमाई का ज़रिया नहीं। उन्होंने भी छोटे-छोटे दांव लगाए। एक सहेली ने 100 रुपये से 300 बना लिए और मस्ती में चिल्ला उठी। उस रात हमने एक-दूसरे से शर्त लगाई कि कौन पहले लालच करके हारेगा। कोई नहीं हारा, क्योंकि हम सब हँसते-हँसते रुक गए।

    आज मैं उस पहली रात को याद करती हूँ जब मैं रोई थी। वो गलती मेरे लिए वरदान बन गई। उसने मुझे सिखाया कि सीमा का मतलब क्या होता है। अब हर बार जब मैं Vavada access mirror पर जाती हूँ, तो मेरे सामने वो अरुण के नोट्स की तस्वीर आती है। मैंने वही नियम अपना लिए हैं।

    अगर कोई मुझसे पूछे, “प्रिया, क्या तुम सफल हो?” तो मैं कहूंगी, “हाँ, क्योंकि मैंने खुद को हराना सीख लिया।” कैसीनो में हजारों लोग जीतते हैं, लाखों हारते हैं, पर असली चैंपियन वही है जो जीत के नशे में और हार के गुस्से में भी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता। मैंने वो मर्यादा पा ली। और एक दिन मैंने अरुण को कहा, “तुमने मुझे जो सिखाया, वो मेरे लिए किसी जैकपॉट से कम नहीं है।”

    वो मुस्कुराया और बोला, “जैकपॉट तो तुम खुद हो, प्रिया। बाकी सब तो बस नंबर हैं।”

    शायद वो सही कह रहा था। असली जीत कभी स्क्रीन पर नहीं आती, वो तो तुम्हारे अंदर रहती है। और मैंने उसे पा लिया।

You must be logged in to reply to this topic.

Concerns or questions?

See our support area where you can find questions asked by our clients and answered by the SeventhQueen team. Lorem ipsum lorem ipsum

SEE SUPPORT AREA
NEWSLETTER SIGNUP

By subscribing to our mailing list you will always be update with the latest news from us.

SIGN INTO YOUR ACCOUNT CREATE NEW ACCOUNT

 
×
 
×
FORGOT YOUR DETAILS?
×

Go up

[pmpro_hasMembership]
Please login to use this feature.
[/pmpro_hasMembership]